भारतीय काव्यशास्त्र शब्दावली


भारतीय काव्यशास्त्र शब्दावली में आपका स्वागत है। यहाँ आप भारतीय काव्यशास्त्र से संबंधित शब्द और वाक्यांश के अर्थ और लक्ष्यार्थ पा सकते हैं। कहीं कहीं अर्थ के साथ साथ टिप्पणी भी की गई है। इस शब्दावली का संकलन करने में मेरा उद्देश्य भारतीय काव्यशास्त्र के बारे में प्राथमिक जानकारी पाना, आम लोगों के लिए अधिक सुलभ बनाना है। शब्दावली के परिशोधन के लिए मैं आपके सुझावों का स्वागत करता हूँ।

- धीरेन्द्र त्रिपाठी (संकलनकर्ता)


काव्य सिद्धांत

काव्यशास्त्र का एक मौलिक प्रस्ताव जो काव्यशास्त्र से जुड़े व्यवहार, प्रणाली या तर्क के लिए आधार के रूप में कार्य करता है।


रस

रस सिद्धांत में काव्यरस को काव्यात्मा स्वीकार किया गया है। काव्य के माध्यम से स्थायी भाव के रमणीय रूप, काव्य के सार को काव्यरस कहा गया है। आचार्य भरत मुनि ने अपने ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' में रस की गहन चर्चा की है। उन्होंने आठ रसों के बारे में लिखा है। आज रसों की संख्या ग्यारह तक स्वीकार की गई है।
इन ग्यारह रसों के अवयवों के रूप में, ग्यारह स्थायी भावों को भी स्वीकार किया गया है। ये ग्यारह स्थायी भाव पाठकों में पहले से ही स्थित होते हैं और कवयित्री/कवि के हृदयसंवाद से, रस में परिणत हो जाते हैं।

ये ग्यारह रस और उनसे जुड़े स्थायी भाव हैं:
१) श्रृंगार रस - स्थायी भाव: रति (प्रेम) २) हास्य रस - स्थायी भाव: हास ३) वीर रस - स्थायी भाव: उत्साह ४) अद्भुत रस - स्थायी भाव: विस्मय ५) करुण रस - स्थायी भाव: शोक ६) रौद्र रस - स्थायी भाव: क्रोध ७) भयानक रस - स्थायी भाव: भय ८) वीभत्स रस - स्थायी भाव: जुगुप्सा (घृणा) ९) शांत रस - स्थायी भाव: शम (निर्वेद) १०) वात्सल्य रस - स्थायी भाव: वत्सल (अपत्यप्रेम) ११) भक्ति रस - स्थायी भाव: भगवत्प्रेम

इन ग्यारह रस और स्थायी भाव से सम्बंधित तैंतीस संचारी भावों को भी स्वीकार किया गया है। ये तैंतीस संचारी भाव, सभी ग्यारह रसों में से किसी भी रस से जुड़ी भावनात्मक परिस्तिथि संचारित कर सकते हैं। ये तैंतीस संचारी भाव हैं:
१) विबोध (जागरण, होश, बोध) २)औत्सुक्य (उत्सुकता) ३) मति ४) श्रम ५) धृति (धैर्य) ६) चपलता ७) हर्ष ८) गर्व ९) स्मृति १०) निर्वेद (विरक्ति) ११) शंका १२) मोह १३) व्रीड़ा (शर्म) १४) आवेग १५) उग्रता १६) मद १७) उन्माद १८) वितर्क १९) आलस्य २०) विषाद २१) दैन्य २२) व्याधि २३) त्रास (कष्ट) २४) चिंता २५) स्वप्न २६) अवहित्था (भाव छिपाना) २७) असूया (ईर्ष्या, पराए गुण में दोष देखना) २८) अमर्ष (असहिष्णुता) २९) ग्लानि ३०) निद्रा ३१) अपस्मार (मूर्छना) ३२) जड़ता ३३) मरण

ये तैंतीस संचारी भावों के अतिरिक्त और भी चंचल अस्थायी भाव हो सकते हैं ऐसा स्वीकार किया गया है।

अलंकार

अलंकार सिद्धांत में अलंकार को काव्य का एक आवश्यक तत्व माना गया है। जो शब्द और अर्थ का संयोग अलंकार समेत है, वह काव्य है ऐसा माना गया है। अलंकार ऐसे शब्द या वाक्यांश होते हैं जिनके गैर शाब्दिक बोध से कविता अधिक शोभामय या मधुर या विचारोत्तेजक हो जाती है। कुछ आचार्यों ने रस और वक्रोक्ति भी काव्य अलंकार बन कर रहते हैं, माना है। काव्य में अलग अलग अलंकारों की संख्या लगातार बढ़ती गयी है और अब सत्तर से अधिक अलंकार स्वीकार किये जाते हैं।

आचार्य भामह ने अपने ग्रन्थ 'काव्यालंकार' में काव्य और अलंकार की विस्तार से चर्चा की है।

रीति

रीति सिद्धांत में रीति को काव्यात्मा स्वीकार किया गया है। रीति सिद्धांत के काव्यगुणों की चर्चा का आरम्भ आचार्य भरत मुनि से हुआ है। आचार्य वामन ने उनके ग्रन्थ 'काव्यालंकार सूत्रवृत्ति' में रीति की चर्चा स्पष्ट रूप से की है। रीति सिद्धांत में दस काव्यगुणों को स्वीकार किया गया है, इनमें से कुछ आचार्यों ने तीन ही को प्रमुख माना है जो हैं माधुर्य, ओज और प्रसाद गुण।
रीति सिद्धांत में गुण, समास और रस के आधार पर वैदर्भी, पांचाली, लाटी और गौडी रीतियों को भी स्वीकार किया गया है। वैदर्भी रीति सभी गुणों सहित कोमल समासहीन मधुर पदों से युक्त होती है। पांचाली रीति सौकुमार्य और माधुर्य गुणों सहित सुकुमार अल्पसमास पदों से युक्त होती है। लाटी रीति एक गौडी रीति के निकट काव्य रीति है, यह रीति मध्यम समास पदों से युक्त होती है। गौडी रीति ओज और कान्ति गुणों सहित दीर्घ समास व बहुला कठोर पदों से युक्त होती है। ये अलग अलग रीतियां प्रारंभ में अलग अलग प्रदेशों में प्रचलित थी। आचार्यों ने रीति को शैली का पर्यायवाची शब्द नहीं माना है।

ध्वनि

ध्वनि सिद्धांत में ध्वनि को काव्यात्मा स्वीकार किया है। इस सिद्धांत का आचार्य आनंदवर्धन ने अपने ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' में प्रवर्तन किया है। ध्वनि सिद्धांत में व्यंग्यार्थ जो कि सांकेतिक, प्रतिध्वनित अर्थ हैं, उसकी प्रधानता स्वीकार की गयी है। यह व्यंग्यार्थ तीनों शब्द शक्तियों, अभिधा, लक्षणा और व्यंजना के आधार पर हो सकता है। आचार्य अभिनव गुप्त ने विशेषकर रसध्वनि को काव्य की आत्मा स्वीकार किया है। ध्वनि सिद्धांत में काव्य में गुण, अलंकार और रीति के अतिरिक्त ध्वनि को एक स्वतंत्र तत्त्व स्वीकार किया गया है।
काव्य में ध्वनि की परिभाषा क्या होनी चाहिए इस पर आचार्य आनंदवर्धन के पूर्व आचार्यों के अलग अलग मत हैं। इस विषय में अगर आपको और जानना हो तो आपको काव्यशास्त्र के विद्वानों के ग्रंथों का अध्यन करना चाहिए।

वक्रोक्ति

वक्रोक्ति सिद्धांत में वक्रोक्ति को काव्य का जीवन माना गया है। विद्वानों ने शब्द और अर्थ की समन्वित वक्रता (टेढ़ापन) को वक्रोक्ति माना है। कुछ आचार्यों ने वक्रोक्ति और अतिशयोक्ति अलंकार को अभेद स्वीकार किया है। वक्रोक्ति आचार्य कुंतक ने अपने ग्रन्थ 'वक्रोक्तिजीवित' में वक्रोक्ति की अवधारणा और वक्रोक्ति के भेदों की चर्चा की है। उसमें उनने वक्रोक्ति के आल्हादत्व को महत्वपूर्ण माना है। आचार्य कुंतक को वक्रोक्ति सिद्धांत का प्रवर्तक माना जाता है।

औचित्य

आचार्य क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रन्थ औचित्यविचारचर्चा में औचित्य सिद्धांत की चर्चा की है। अपने ग्रन्थ में आचार्य ने माना है कि काव्य के प्रत्येक अंग और उपांग शब्द, अर्थ, वर्ण, रस, अलंकार, रीति आदि सबमें औचित्य (उपयुक्तता, योग्यता, दोष-रहित होने की अवस्था) की स्थिति होना अनिवार्य है। औचित्य होने पर ही काव्यरस अत्यधिक आस्वादनीय होकर हृदय में व्याप्त होता है। अर्वाचीन विद्वानों ने औचित्य को महत्वपूर्ण मानते हुए औचित्य को अपने आप में एक स्वतंत्र काव्यसिद्धांत कम माना है।

काव्य गुण

ये काव्य से जुड़े वे विशिष्ट गुण हैं जिनसे काव्य में उत्तमता समाती है।

काव्यशास्त्र में गुण शोभाकारक हैं। आचार्य वामन ने दस शब्द तथा अर्थ गुण प्रस्तुत किये हैं।

लौकिक जीवन में आत्मा और शरीर दोनों का महत्व होते हुए भी आत्मा के महत्व को अधिक माना गया है। उसी तरह कई विद्वानों ने काव्य गुण के स्रोत का काव्यात्मा होना, काव्यशरीर होने से अधिक महत्वपूर्ण माना है। ऐसा विशेषकर तीन प्रमुख गुणों के लिए माना गया है, माधुर्य, प्रसाद और ओज


माधुर्य

काव्यात्मा से जुड़ा कविता का चित्त को द्रवित, आह्लादित करने का गुण माधुर्य है।

प्रसाद

अर्थ की स्पष्टता प्रसाद गुण है। काव्यात्मा से जुड़ा कविता का चित्त को शीघ्र प्रभावित करने का गुण प्रसाद है।

ओज

चित्त को आलोकित करना ओज गुण है।

श्लेष

किसी शब्द के विभिन्न अर्थों का उपयोग करना।

समता

कविता की रचना में समानता होना समता गुण है। जैसे पद रचना के प्रारम्भ और अंत की समानता, रीति की समानता, समता गुण है।

समाधि

अर्थ की चमत्कारी विशेषता समाधि गुण है। जैसे कि एक अप्रस्तुत वस्तु के गुण-धर्म को प्रस्तुत वस्तु पर आरोपित करना।

पदसौकुमार्य

रचना की कोमलता पदसौकुमार्य गुण है।

अर्थव्यक्ति

इच्छित अर्थ स्पष्टता पूर्वक व्यक्त होना अर्थव्यक्ति गुण है।

उदारता

लोकोत्तर, अलौकिक असाधारण चमत्कार को व्यक्त करने वाली वाक्य-रचना उदारता गुण है। जैसे की रचना में श्लाध्य, प्रशंसनीय विशेषणों से युक्त वाक्य होना। रचना की असाधारण विशालता उदारता गुण है। जैसे की रचना के भाव, विचार, कल्पना की विशालता।

कान्ति

रचना की दीप्ति, चमक कान्ति गुण है।

शब्दशक्ति

शब्द के प्रभाव से एक विचार या भावना व्यक्त करने की शक्ति


अभिधा

अभिव्यक्ति की शक्ति

लक्षणा

शब्द की लक्षण, संकेत की शक्ति

व्यंजना

शब्द की सांकेतिक विचारोत्तेजक शक्ति

उच्चारणजनित प्रभाव

बोलने से उत्पन्न होने वाला प्रभाव


घोष

वह व्यंजन जिनके उच्चारण में हवा का स्वर-तंत्रियों (वोकल कॉर्ड) से घर्षण होता हो। सभी स्वर घोष होते हैं। ग् घ् ङ् ज् झ् ञ् ड् ढ् ण् द् ध् न् ब् भ् म् य् र् ल् व् ह् ग़ ज़ ड़ ढ़ घोष व्यंजन हैं।

अघोष

वह व्यंजन जिनके उच्चारण में हवा का स्वर-तंत्रियों से घर्षण न होता हो। क् ख् च् छ् ट् ठ् त् थ् प् फ् श् ष् स् अघोष व्यंजन हैं।

अल्पप्राण

वह व्यंजन जिसके उच्चारण में कम प्राण (साँस) का प्रयोग हो। अल्पप्राण व्यंजन में उच्चारणजनित कोमलता अधिक होती है। सभी स्वर अल्पप्राण होते हैं। क् ग् ङ् च् ज् ञ् ट् ड् ण् त् द् न् प् ब् म् य् र् ल् व् क़ ग़ ज़ ड़ अल्पप्राण व्यंजन हैं।

महाप्राण

वह व्यंजन जिसके उच्चारण में अधिक प्राण का प्रयोग हो। महाप्राण व्यंजन में उच्चारणजनित कठोरता अधिक होती है। ख् घ् छ् थ् ध् ठ् ढ् झ् फ् भ् स् ह् श् ष् ख़ फ़ ढ़ महाप्राण व्यंजन हैं।

कोमलता

सुकुमार्य, मृदुता

उच्चारण में कोमलता वाले स्वरों और व्यंजनों का प्रयोग सुकुमार कोमल पदों वाली रचना में होता है। ह्रस्व स्वरों का कोमलता से कठोरता का क्रम इस प्रकार है: उ, इ , अ। दीर्घ स्वर ह्रस्व स्वरों से कम कोमल होते हैं, उनका कोमलता से कठोरता का क्रम इस प्रकार है: ओ, ए, औ, ऐ, ऊ, ई, आ।

उच्चारणजनित कोमलता के व्यंजनों का कोमलता से कठोरता का क्रम इस प्रकार है: य्, व्, र्, ल्, स्, ह्, न्, म्, श्, ष् , क्, च्, त्, प्, ग्, ज्, द्, ब्।

उच्चारणजनित कठोरता के व्यंजनों का कोमलता से कठोरता का क्रम इस प्रकार है: ख्, छ्, थ्, फ्, घ्, भ्, ण्, ढ्, ट्, ठ्। इनमें से जो व्यंजन महाप्राण हैं उनमें एक से अधिक कठोरता है।

कठोरता

कड़ापन, सख़्ती

छंद शास्त्र


छंद

वर्णो या मात्राओं की नियमित संख्या की रचना के साथ यति और गति के विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्यरचना।

चरण / पद / पाद

कविता की एक लाइन, चार लाइन के छंद का चौथा भाग

वर्ण

वह अक्षर जिनमें स्वर की ध्वनि भी हो। वर्ण, ह्रस्व (लघु) या दीर्घ (गुरु) हो सकते हैं। वर्ण में स्वर और व्यंजन दोनों हो सकते हैं, जैसे कि रि (लघु) और रा (गुरु)। स्वर के बिना ध्वनि (जैसे कि न्) को वर्ण नहीं माना जाता है।

मात्रा

वर्ण के उच्च्चरण में लगने वाले समय की अवधि से वर्ण की मात्रा गिनी जाती है। कम अवधि वाले 1 मात्रा के वर्ण लघु माने जाते हैं और अधिक अवधि वाले 2 मात्रा के वर्ण गुरु माने जाते हैं।

गण

ऊपर दिए गए वर्णन वाले तीन वर्णो के समूह को गण कहते हैं।

लघु वर्ण

ह्रस्व स्वर वाले वर्ण। इनके स्वर अ, इ, उ, ऋ; क, कि, कु या कृ होते हैं।

गुरु वर्ण

दीर्घ स्वर वाले वर्ण। इनके स्वर आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, या औ होते हैं।

गति

छंद के पढ़ने में प्रवाह और लय की संयुक्ति को गति कहते हैं।

यति / विराम

चरण के बीच में या अंत में विश्राम। जहाँ पढ़ते समय साँस ली जा सकती है।

तुक

चरण के अंतिम वर्णों का समान स्वरयुक्त होना।

मुक्त छंद

ऐसी कविताएँ जिनके चरणों में वर्णो या मात्राओं का क्रम निर्धारित नहीं है।

मात्रिक छंद

ऐसे छंद जिनमें मात्राओं का क्रम निर्धारित हो।

वर्णिक छंद

ऐसे छंद जिनमें गणों का क्रम निर्धारित हो।

अन्य


स्फोट

श्रूयमाण वर्ण की सम्पूर्ण प्रक्रिया, श्रुति का पूर्ण होना स्फोट है। वर्णों के स्फोट से प्रतीत होने वाला अर्थ, शब्द-स्फोट है। वर्ण के उच्चारण की क्रिया से ध्वनि रूप तरंग बनती हैं। फिर यह तरंग सुनने वाले के कान के परदे से टकराने की क्रिया होती है। तीसरी क्रिया में इन टकराई हुई तरंगों का वर्ण रूप ध्वनि में परिवर्तित होना है। इस पुनर्निर्मित ध्वनिरूप नाद वर्ण का ग्रहण स्फोट है। यह भी कहा गया है कि प्रथम वर्ण के उच्चारण के प्रभाव से ले कर अंतिम वर्ण के उच्चारण के अनुभव से अर्थ की अभिव्यक्ति स्फोट है।

काव्य सृजन

काव्य सृजन के बारे में भारतीय काव्यशास्त्र में विस्तृत चर्चा की गयी है और यह पूरे कला सृजन विषय पर मंथन माना जा सकता है। इस चर्चा के अंतर्गत एक विचारधारा है कि कवयित्री/कवि की संवेदनशीलता और चेतना से कवयित्री/कवि की भावात्मकता, विचारात्मकता और कल्पनात्मकता प्रभावित होती रहती है। इनमें से कुछ प्रभाव कवयित्री/कवि को अधिक प्रेरित करते हैं। यहीं से काव्य सृजन की प्रक्रिया का प्रारम्भ होता है। फिर कवयित्री/कवि अपने कौशल के बल पर अपनी चेतना, अनुभूति और कल्पना से युक्त पदों और छंदों को सांचते हैं।

सहृदय

व्यक्ति जो कोई कला के प्रति संवेदनशील हो।

सहृदयता

कोई कला के प्रति संवेदनशीलता। भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार सहृदयता से कवयित्री/कवि और सहृदय के बीच एक गहरा सम्बंध स्थापित हो जाता है। इस सम्बंध के भिन्न भिन्न पहलुओं का भारतीय काव्यशास्त्र में अति सूक्षम्ता से विश्लेषण किया गया है। इस शब्दावली में आपको इसके कई संकेत मिलेंगे लेकिन इस विषय को अच्छे से समझने के लिए भारतीय काव्यशास्त्र के प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के लिखे हुए ग्रन्थ पढ़ने चाहिए।

कौशल

प्रतिभा, सिध्दहस्तता। काव्य के सन्दर्भ में कौशल, भावपूर्ण कलात्मक अभिव्यक्ति की क्रिया क्षमता है।

सुकुमार बुद्धिमानी

कोमल संवेदनशील बुद्धि। सुकुमार बुद्धि वाले लोग काव्य में अधिक रस, ध्वनि व मनोरंजन पाते हैं।

श्रुति मधुर

सुरीला, सुनने में अच्छा

श्रुति कटुत्व

सुनने में कटु, अप्रिय

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आभार

यह शब्दावली बनाने का प्रयास कर पाने के लिए मैं अतीत एवं वर्तमान के विद्वानों का बहुत बहुत आभारी हूँ। मैं विशेषकर डॉ ज्ञानराज काशिनाथ गायकवाड 'राजवंश', पद्म श्री प्रोफ. अभिराज राजेंद्र मिश्र और डॉ भगीरथ मिश्र के प्रति कृतज्ञ हूँ। इनके काव्यशास्त्र के ज्ञान के प्रकाश से मुझे यह शब्दावली बनाने का प्रयास करने का साहस मिला है।

मैं काव्यालय की वाणी मुरारका जी और डॉ नूपुर अशोक जी की समय समय पर दी गई प्रतिक्रियाएं, सुझावों और उनके कार्यान्वयन में सहयोग के लिए बहुत आभारी हूँ।

संदर्भ ग्रंथ

कृपया अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव इस ईमेल आईडी पर भेंजें: sampark@bkshabdavali.karmyogi.com